जो राग उठे हैं मेरे मन में, उन्हें दबाकर क्यों रक्खा है,
स्वप्न जगे हैं जो नयनों में , उन्हें सुलाकर क्यों रक्खा है ?
जीने की हर चाहत ने भी , अब जीना जैसे छोड़ दिया ,
जो लम्हे तेरे संग बीते हैं , उन्हें जिलाकर क्यों रक्खा है ?
माना मौसम बदल रहे हैं ,खुशियाँ लेकर आ जाते हैं ,
लेकिन तेरी मुस्कानों के, वो कमल कहाँ खिल पाते हैं ?
झीलें झिलमिल -सी लगतीं हैं ,झरने झर -झर से झरते हैं ,
लेकिन तेरे पंख पखेरू ,मुझे यहाँ कब मिल पाते हैं ?
जग की धूमिल तस्वीरों में , तुझे सजाकर क्यों रक्खा है ?
तुझको रचता हूँ मैं अपने ,सीने की धड़कन से सीकर ,
तुझे खिलाता हूँ मैं अपने ,आँसू की शबनम से धोकर /
मिट्टी के पुतले हैं माना ,लेकिन कोई बात नहीं है ,
तुझे बुलाता हूँ जब भी मैं , रोम -रोम में कलम डुबोकर //
नहीं पता क्यों मैंने तुझको , खुदा बनाकर क्यों रक्खा है ?
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