अभी -अभी तो मेरे दर पर सुबह सुहानी आकर उतरी ,
कोहरे की चादर में लिपटी धूप सुहानी आकर उतरी /
अभी -अभी तो कलियाँ खिलकर, बस , थोड़ी -सी शरमायीं हैं ,
अभी -अभी तो धुंध हटी है , खुशबु बह -बहकर आयीं हैं /
वृक्षों की भीगी डालों पर , अभी - अभी तो मन भीगा है ,
जाने कितने मौन पलों की , कुंठाएं जीने आयीं हैं /
खग -कूजन की ध्वनियाँ हों या मंदिर -पूजन गूँज रहा हो ,
देखो तो ,वो मदिर -मदिर -सी एक निशानी आकर उतरी /
हर दिन जैसे मेरे दर पर ,कोई यों ही आ जाता है ,
ख्वाब तुम्हारा झिलमिल होकर इन पलकों में उतराता है /
माना कुछ भी नहीं बचा है ,लेकिन फिर भी मैं जिन्दा हूँ ,
इन्हीं सुहाने लम्हों में फिर ,मुझको क्या-क्या हो जाता है /
इस धरती के त्रण-त्रण पर तुम ,प्रतिबिंबित -सी हो जाती हो ,
लगता है फिर जैसे मेरी एक कहानी आकर उतरी /
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