मंगलवार, 10 जनवरी 2012

खिले हुए कुछ फूल दिखे तो , समय गुजारा धीरे-धीरे,
पता नहीं कितने काँटों का ,बोझ उतारा धीरे -धीरे //
हमें पता था कुछ मोहक -सा द्रश्य मिलेगा इन राहों में ,
ओस बिछी थी पूरे पथ पर,तुम्हें निहारा धीरे-धीरे //
माना बदले थे सब अपने ,टूट चुके थे कितने सपने ,
कोई बादल उठा गगन में ,उसे पुकारा धीरे-धीरे //
कोई ऐसा दर्द नहीं था , जिसको हमने नहीं बहाया ,
नहा गए थे हम गंगा में ,फिसल-फिसल कर धीरे -धीरे //
कोई मौसम दिखा ना ऐसा ,जिसने हमको नहीं मनाया,
मगर हमारे शोले तुमको ,मना रहे थे धीरे- धीरे //
इन फूलों के हर पाटल पर ,चमक रहीं कुछ मुद्राएँ थीं,
खींच रहीं थीं हमको अपनी ,आँखों से वो धीरे-धीरे //
हमने खुद को खोकर देखा ,सारा कर्ज डुबोकर देखा ,
बचा न हमपर कुछ भी शायद,लुटा दिया था धीरे -धीरे //

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