वो खेतों की पगडण्डी थी, जिसपर चलने की आदत थी ,
कहीं - कहीं थी ऊँची -नीची, कहीं -कहीं पर फिसलाहट थी /
अगल -बगल में मचल -मचल कर , फसलें लहराया करतीं थीं ,
जाने कितनी आजादी के, अरमान जगाया करतीं थीं //
मैं चलता था संभल -संभल कर, नभ को छूने की चाहत थी /
कभी कृषक के ,कभी श्रमिक के ,उद्वेलन मन में उठते थे ,
कुछ थकित पसीने की बूँदें ले , वो माथे पर खिलते थे //
गेहूँ की बालें छू -छू कर ,आलिंगन करने लगतीं थीं ,
जो बीज धरा पर बोये थे ,खलियानों को भरते थे //
जाने कितनी अलमस्ती थी, जीवन की कितनी आहट थी /
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