खिले हुए कुछ फूल दिखे तो , समय गुजारा धीरे-धीरे,
पता नहीं कितने काँटों का ,बोझ उतारा धीरे -धीरे //
हमें पता था कुछ मोहक -सा द्रश्य मिलेगा इन राहों में ,
ओस बिछी थी पूरे पथ पर,तुम्हें निहारा धीरे-धीरे //
माना बदले थे सब अपने ,टूट चुके थे कितने सपने ,
कोई बादल उठा गगन में ,उसे पुकारा धीरे-धीरे //
कोई ऐसा दर्द नहीं था , जिसको हमने नहीं बहाया ,
नहा गए थे हम गंगा में ,फिसल-फिसल कर धीरे -धीरे //
कोई मौसम दिखा ना ऐसा ,जिसने हमको नहीं मनाया,
मगर हमारे शोले तुमको ,मना रहे थे धीरे- धीरे //
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें