शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

पत्ते खड़के, बुंदियाँ बरसीं ,मेघा नभ में फिर घिर आये /
प्रियतम मेरे ,बिना तुम्हारे ,मनवा कैसे अगन बुझाए //
बहीं द्रगों से यादें तेरी ,किसने देखा ,किसने जाना /
अक्सर तुझको ,हमने इनमें ,भिगो -भिगो कर ही पहचाना //
काया फड़की,बिजली कड़की , मेघा नभ में फिर घिर आये /
अभी बहुत ही सघन घटा थी, द्रश्य बदलते देखे हमने ,
इस धरती से उस अम्बर तक ,स्वप्न मचलते देखे हमने //
अभी धरा पर अंकुर फूटे ,अभी तुम्हारा मुखड़ा देखा ,
पता नहीं कितने जन्मों के भाव उमड़ते देखे हमने //
बिम्ब हुए थे कितने झिलमिल , बदरा नभ में फिर घिर आये //
शायद कुछ पल ऐसे आयें ,पास तुम्हें जो फिर ले आयें ,
कुछ तुम ही हममें खो जाओ ,या कुछ हम तुममें खो जायें //
माना दुनिया इक मेला है ,कुछ साँसों का ही खेला है,
आओ हम भी चलकर फिर से,अपनी दुनिया नई बसायें //
टप -टप करते बूंद -बूंद से मेघा नभ में फिर घिर आये //

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