क्यों हजारों दिल हमारे ,पास आते जा रहे हैं ,
क्या तुम्हारी याद इतनी ,रूबरू हमसे हुई है //
प्यार की अंधी गली में ,लोग भटके जा रहे हैं,
क्या तुम्हारे प्यार की बस ,आबरू हमपर बची है //
गुरुवार, 29 दिसंबर 2011
मंगलवार, 27 दिसंबर 2011
रविवार, 25 दिसंबर 2011
नहीं किसी का सुख छीना है, नहीं किसी से की बेमानी,
दाना चुगने में भी डरकर, उड़ा हजारों बार सेलानी //
कभी खेत पर खलियानों पर ,इसने सिक्का नहीं जमाया ,
कभी दिखा तरु शाखों पर तो ,कभी पिया झीलों का पानी //
अभी बहुत उड़ना है इसको ,नये ठिकाने चुनने को ,
अभी थका है नभ का पंछी , कल का सूरज उगने दो //
कितना प्यारा यह लगता है, राजदुलारा यह लगता है ,
इस दुनिया की किस्मत जैसे ,अपने पंखों में रखता है //
चलो इसी से मिलकर आयें , इसको दिल का हाल बतायें ,
आखिर इसके और हमारे, जीवन में क्या निर्भरता है ?
सभी दिशायें खुलने दो , तम के पार निकलने दो ,
अभी थका है नभ का पंछी ,कल का सूरज उगने दो //
दाना चुगने में भी डरकर, उड़ा हजारों बार सेलानी //
कभी खेत पर खलियानों पर ,इसने सिक्का नहीं जमाया ,
कभी दिखा तरु शाखों पर तो ,कभी पिया झीलों का पानी //
अभी बहुत उड़ना है इसको ,नये ठिकाने चुनने को ,
अभी थका है नभ का पंछी , कल का सूरज उगने दो //
कितना प्यारा यह लगता है, राजदुलारा यह लगता है ,
इस दुनिया की किस्मत जैसे ,अपने पंखों में रखता है //
चलो इसी से मिलकर आयें , इसको दिल का हाल बतायें ,
आखिर इसके और हमारे, जीवन में क्या निर्भरता है ?
सभी दिशायें खुलने दो , तम के पार निकलने दो ,
अभी थका है नभ का पंछी ,कल का सूरज उगने दो //
शनिवार, 24 दिसंबर 2011
शब्दों से जब धुन निकलेगी ,साज तुम्हारा उनमें होगा,
जितने दिल में भरे खजाने ,राज तुम्हारा उनमें होगा //
अगर चुनेगा कोई आकर ,बचा हुआ सामान पुराना ,
कंकड़ -पत्थर जो निकलेंगे ,ताज तुम्हारा उनमें होगा //
बुझी नहीं चिंगारी अबतक ,राख तुम्हारी है माथे पर ,
हसरत जलकर बुझी नहीं हैं ,याद तुम्हारी है माथे पर //
शोले कितने दहक रहे हैं ,अभी चिता के तेरी मुझमें ,
दूंद रहा हूँ उनमें तुमको ,फूँक लगाकर मैं माथे पर //
शायद कोई बीते कल का , आज तुम्हारा उनमें होगा //
क्यों होती है इस दुनिया में ,इस जीवन की , ख़तम कहानी ,
रह जाता है क्यों पलकों में , तृष्णाओं का खारा पानी //
अभी हजारों साँसों का वो ,मेला तुमने ही जोड़ा था ,
तुम ही मिलकर बिछुड़ गए क्यों , ध्वस्त हो गयीं सभी निशानी //
अगर खिलीं यह कलियाँ फिर से ,सोज तुम्हारा उनमें होगा //
जितने दिल में भरे खजाने ,राज तुम्हारा उनमें होगा //
अगर चुनेगा कोई आकर ,बचा हुआ सामान पुराना ,
कंकड़ -पत्थर जो निकलेंगे ,ताज तुम्हारा उनमें होगा //
बुझी नहीं चिंगारी अबतक ,राख तुम्हारी है माथे पर ,
हसरत जलकर बुझी नहीं हैं ,याद तुम्हारी है माथे पर //
शोले कितने दहक रहे हैं ,अभी चिता के तेरी मुझमें ,
दूंद रहा हूँ उनमें तुमको ,फूँक लगाकर मैं माथे पर //
शायद कोई बीते कल का , आज तुम्हारा उनमें होगा //
क्यों होती है इस दुनिया में ,इस जीवन की , ख़तम कहानी ,
रह जाता है क्यों पलकों में , तृष्णाओं का खारा पानी //
अभी हजारों साँसों का वो ,मेला तुमने ही जोड़ा था ,
तुम ही मिलकर बिछुड़ गए क्यों , ध्वस्त हो गयीं सभी निशानी //
अगर खिलीं यह कलियाँ फिर से ,सोज तुम्हारा उनमें होगा //
मंगलवार, 20 दिसंबर 2011
रविवार, 18 दिसंबर 2011
बुधवार, 14 दिसंबर 2011
सोमवार, 12 दिसंबर 2011
गुरुवार, 8 दिसंबर 2011
मंगलवार, 6 दिसंबर 2011
आज दिनांक - 6, १२, २०११ -वैशाली , गाजियाबाद में श्री देवेन्द्र चौधरी 'तुषार' के निवास स्थान पर एक भावभीनी काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ /जिसमें गाजियाबाद ,बागपत, तथा दिल्ली से निमंत्रित कुछ प्रमुख कवियों ने अपना कविता पाठ किया तथा कविता पर काफी बृहद चर्चायें हुईं /गोष्ठी की अध्यक्षता ''तुषार ''ने की /संचालन श्री मोहन द्विवेदी ने किया /'' तुषार '' ने अपने गीत इस प्रकार सुनाये ----
चाँद नहीं निकला है कबसे , नींदें मुझसे पूछ रहीं हैं /
तू जागा है , या सोया है ,नींदें मुझसे पूछ रहीं हैं //
दूसरा गीत इस प्रकार था ---
खुशबुओं से तरबतर हो यह हवायें बह रहीं हैं /
तुम यहीं हो ,पास में हो , हाल हमसे कह रहीं हैं //
अरुण सागर ने अपना गीत इस प्रकार सुनाया--
आग तृषा की जलाना छोड़ दे
और अभिमानों की गागर फोड़ दे /
तू संजो कर रख ह्रदय में प्रीत रे
झूमकर तू गा ख़ुशी का गीत रे /
चन्द्र भानु मिश्र ने अपना गीत इस प्रकार सुनाया ----
मैंने जिनको सहारा दिया सर्वदा
क्या वे मेरा सहारा बनेंगे कभी /
जिनकी सेवा में मैं आज पत्थर हुआ
काम नहीं आई देवता की दुआ
जिन्दगी यंत्र जिनके लिए बन गई /क्या...
मोहन द्विवेदी की कविता व्यंग करती हुई कुछ कह रही थी---
सोच रहे हैं चतुरी साहब ,पैसे वाला पूरा गाँव
फिर क्यों चलती नहीं दुकान
अब तो बच्चे भी खाते हैं ,गुड से ज्यादा गुटका पान /
आचार्य नगेन्द्र प्रसाद द्विवेदी की कविता शहर और गाँव का अंतर बता रही थी --
शहर का शीशा बड़ा है ,बिम्ब मेरा भी चला है उभरने पटल पर
छोड़कर गाँव ,शोर भरे शहर में , धुंआ भरे नगर में ,कुछ तो हुआ है ?
डा ० जय शंकर शुक्ल की रचना भी नगर की जिन्दगी पर सोच में डूबी थी ----
नगर की यह जिन्दगी है जो हमें सीख देती है ,
राह कितनी भी कठिन हो व्यथित मन को जीत देती है /
इस तरह साहित्यिक काव्य संस्था ''काव्य शिल्पी ''के तत्वावधान यह काव्य गोष्ठी नये आयामों तथा उच्च स्तर के जाने माने कवियों के / सानिध्य में
अपना पूरा काव्य सौष्ठव बिखेरती हुई संपन्न हुई /
प्रेस विज्ञप्ति
चाँद नहीं निकला है कबसे , नींदें मुझसे पूछ रहीं हैं /
तू जागा है , या सोया है ,नींदें मुझसे पूछ रहीं हैं //
दूसरा गीत इस प्रकार था ---
खुशबुओं से तरबतर हो यह हवायें बह रहीं हैं /
तुम यहीं हो ,पास में हो , हाल हमसे कह रहीं हैं //
अरुण सागर ने अपना गीत इस प्रकार सुनाया--
आग तृषा की जलाना छोड़ दे
और अभिमानों की गागर फोड़ दे /
तू संजो कर रख ह्रदय में प्रीत रे
झूमकर तू गा ख़ुशी का गीत रे /
चन्द्र भानु मिश्र ने अपना गीत इस प्रकार सुनाया ----
मैंने जिनको सहारा दिया सर्वदा
क्या वे मेरा सहारा बनेंगे कभी /
जिनकी सेवा में मैं आज पत्थर हुआ
काम नहीं आई देवता की दुआ
जिन्दगी यंत्र जिनके लिए बन गई /क्या...
मोहन द्विवेदी की कविता व्यंग करती हुई कुछ कह रही थी---
सोच रहे हैं चतुरी साहब ,पैसे वाला पूरा गाँव
फिर क्यों चलती नहीं दुकान
अब तो बच्चे भी खाते हैं ,गुड से ज्यादा गुटका पान /
आचार्य नगेन्द्र प्रसाद द्विवेदी की कविता शहर और गाँव का अंतर बता रही थी --
शहर का शीशा बड़ा है ,बिम्ब मेरा भी चला है उभरने पटल पर
छोड़कर गाँव ,शोर भरे शहर में , धुंआ भरे नगर में ,कुछ तो हुआ है ?
डा ० जय शंकर शुक्ल की रचना भी नगर की जिन्दगी पर सोच में डूबी थी ----
नगर की यह जिन्दगी है जो हमें सीख देती है ,
राह कितनी भी कठिन हो व्यथित मन को जीत देती है /
इस तरह साहित्यिक काव्य संस्था ''काव्य शिल्पी ''के तत्वावधान यह काव्य गोष्ठी नये आयामों तथा उच्च स्तर के जाने माने कवियों के / सानिध्य में
अपना पूरा काव्य सौष्ठव बिखेरती हुई संपन्न हुई /
प्रेस विज्ञप्ति
सोमवार, 5 दिसंबर 2011
रविवार, 4 दिसंबर 2011
शनिवार, 3 दिसंबर 2011
मंगलवार, 29 नवंबर 2011
धुंए पर गीत लिखता हूँ , धुंआ दिल से उठा होगा ,
न जाने किन ख्वाबों का , धुआं दिल से उठा होगा //
न जाने कौन -सी होंगी , वो लपटें झोंकती दिल को ,
जिन्हें तुमने सहा होगा , जिन्हें हमने दहा होगा //
बिछुड़ने का नहीं मातम ,न मिलने की ख़ुशी इतनी ,
सुबह से शाम तक उतरी , निगाहों में नमी कितनी //
वो कुछ दिन या महीने कुछ ,कहाँ तक वो ठहर पाते ,
तुम्हारे साथ जीने की तमन्नायें घुटीं कितनी //
चले जाते हैं अक्सर ही , हजारों लोग दुनिया से ,
किसी से पूछ तो लेते ,कहाँ तूफाँ उठा होगा //
तुम्हारी भी निगाहों में ,सबेरे कुछ समाये थे ,
हमारी भी निगाहों में ,अँधेरे कुछ समाये थे //
दफ़न होते रहे कैसे ,इशारों ही इशारों में ,
वो नगमे जो कभी तुमको ,महोब्बत के सुनाये थे //
वो जाने की खबर सुनकर , कहाँ तुम जा रहे हो अब ,
हमारी जिंदगानी में , रुआं कैसा उठा होगा //
समय करवट बदलता था ,सहमकर ही गुजरता था ,
हमारे प्यार की भीगी -लिखावट को समझता था //
हजारों कल्प जो हमने ,निगाहों में बिताये थे ,
उन्हें महसूस करता था , उन्हें तस्लीम करता था //
मगर चलने से पहले ही ,तुम्हें वो छीनने आया ,
बताते हम उसे कैसे ,, हमारा क्या हुआ होगा //
धुंए पर गीत लिखता हूँ , धुंआ दिल से उठा होगा ///
न जाने किन ख्वाबों का , धुआं दिल से उठा होगा //
न जाने कौन -सी होंगी , वो लपटें झोंकती दिल को ,
जिन्हें तुमने सहा होगा , जिन्हें हमने दहा होगा //
बिछुड़ने का नहीं मातम ,न मिलने की ख़ुशी इतनी ,
सुबह से शाम तक उतरी , निगाहों में नमी कितनी //
वो कुछ दिन या महीने कुछ ,कहाँ तक वो ठहर पाते ,
तुम्हारे साथ जीने की तमन्नायें घुटीं कितनी //
चले जाते हैं अक्सर ही , हजारों लोग दुनिया से ,
किसी से पूछ तो लेते ,कहाँ तूफाँ उठा होगा //
तुम्हारी भी निगाहों में ,सबेरे कुछ समाये थे ,
हमारी भी निगाहों में ,अँधेरे कुछ समाये थे //
दफ़न होते रहे कैसे ,इशारों ही इशारों में ,
वो नगमे जो कभी तुमको ,महोब्बत के सुनाये थे //
वो जाने की खबर सुनकर , कहाँ तुम जा रहे हो अब ,
हमारी जिंदगानी में , रुआं कैसा उठा होगा //
समय करवट बदलता था ,सहमकर ही गुजरता था ,
हमारे प्यार की भीगी -लिखावट को समझता था //
हजारों कल्प जो हमने ,निगाहों में बिताये थे ,
उन्हें महसूस करता था , उन्हें तस्लीम करता था //
मगर चलने से पहले ही ,तुम्हें वो छीनने आया ,
बताते हम उसे कैसे ,, हमारा क्या हुआ होगा //
धुंए पर गीत लिखता हूँ , धुंआ दिल से उठा होगा ///
रविवार, 27 नवंबर 2011
हवाओं से लिपट कर के , जरा मैंने कहा रुकना ,
अभी आँचल उड़ाती -सी उसी की याद आयेगी //
उसी की शोखियाँ होंगी ,उसी की मस्तियाँ होंगी ,
फिजाओं को लजाती -सी , हसीं सौगात आयेगी //
यहाँ जो स्वप्न बिखरे हैं ,जरा उनको समेटूंगा ,
उसी के हाथ की कोई ,बुनी तकदीर लेखूँगा //
उसी से रूठना है फिर ,उसी को फिर मनाना है ,
उसी के प्यार की कोई ,नई तस्वीर खींचूंगा //
बहारों को पता है ये ,अगर फिर चूड़ियाँ खनकीं ,
उसी के रश्क में डूबी , शबे -बारात आयेगी //
निशानी जो बचीं उसकी ,जिलाती जा रहीं हैं वो,
दृगों में जो भरा पानी , बहाती जा रहीं हैं वो //
उसी की हलचलों में यह , समय कुछ बीत जाता है ,
कहीं दिल की दराजों में ,समाती जा रहीं हैं वो //
दिशाओं में महकती है , कहीं वो रात -रानी -सी ,
कदम हौले बदाती -सी ,दिले -नाशाद आएगी //
अभी आँचल उड़ाती -सी उसी की याद आयेगी //
उसी की शोखियाँ होंगी ,उसी की मस्तियाँ होंगी ,
फिजाओं को लजाती -सी , हसीं सौगात आयेगी //
यहाँ जो स्वप्न बिखरे हैं ,जरा उनको समेटूंगा ,
उसी के हाथ की कोई ,बुनी तकदीर लेखूँगा //
उसी से रूठना है फिर ,उसी को फिर मनाना है ,
उसी के प्यार की कोई ,नई तस्वीर खींचूंगा //
बहारों को पता है ये ,अगर फिर चूड़ियाँ खनकीं ,
उसी के रश्क में डूबी , शबे -बारात आयेगी //
निशानी जो बचीं उसकी ,जिलाती जा रहीं हैं वो,
दृगों में जो भरा पानी , बहाती जा रहीं हैं वो //
उसी की हलचलों में यह , समय कुछ बीत जाता है ,
कहीं दिल की दराजों में ,समाती जा रहीं हैं वो //
दिशाओं में महकती है , कहीं वो रात -रानी -सी ,
कदम हौले बदाती -सी ,दिले -नाशाद आएगी //
शुक्रवार, 25 नवंबर 2011
कितने दिन से दिल टूटा है , कितने दिन से नहीं मिले हो ,
इन नयनों की पलकों में तुम ,कितने दिन से नहीं खिले हो /
मीलों -मीलों धूप खिली थी ,जब तुम बाँहों में आये थे ,
कितने मौसम बदल -बदल कर ,इस धरती पर इठलाये थे ,
छलक चुकीं हैं झीलें कितनी ,कबसे ,अबतक नहीं मिले हो /
नदियों में जो जल बहता है ,शायद खारा हो जायेगा ,
बिन बरसे यह नभ का बादल ,धुंआ -धकारा हो जायेगा ,
इसे बरसने दो तुम आखिर ,आखिर कबसे नहीं मिले हो /
जाने वाले जब जाते हैं ,सामान दिलों का ले जाते हैं ,
इस मिट्टी में क्या बचता है, जान हमारी ले जाते हैं ,
फिर भी हमको जीना है कुछ , जीवन दोते नहीं मिले हो /
इन नयनों की पलकों में तुम ,कितने दिन से नहीं खिले हो /
मीलों -मीलों धूप खिली थी ,जब तुम बाँहों में आये थे ,
कितने मौसम बदल -बदल कर ,इस धरती पर इठलाये थे ,
छलक चुकीं हैं झीलें कितनी ,कबसे ,अबतक नहीं मिले हो /
नदियों में जो जल बहता है ,शायद खारा हो जायेगा ,
बिन बरसे यह नभ का बादल ,धुंआ -धकारा हो जायेगा ,
इसे बरसने दो तुम आखिर ,आखिर कबसे नहीं मिले हो /
जाने वाले जब जाते हैं ,सामान दिलों का ले जाते हैं ,
इस मिट्टी में क्या बचता है, जान हमारी ले जाते हैं ,
फिर भी हमको जीना है कुछ , जीवन दोते नहीं मिले हो /
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