बहुत सुकोमल कली खिली है ,शायद तुमने भी देखा हो ,
झीलों पर कुछ धूप खिली है ,द्रश्य मनोरम यह देखा हो //
अभी- अभी कुछ पर्वत पिघले ,अभी -अभी कुछ झरने निकले ,
धीमी-धीमी हवा चली है , शायद तुमने भी देखा हो //
कोई दिल की भाषा शायद ,मुखर हुई है अभी -अभी कुछ ,
शायद तुमने इन तरुओं में ,गया जमाना फिर देखा हो //
मेरी भटकी अंखियों में तुम , मचल-मचल कर रह जाते हो ,
एक सलोना सपना शायद ,जीवित तुमने फिर देखा हो //
कहाँ गए हो, पास खड़े हो,महसूस हमेशा होते हो ,
पक्षी नभ में जब उड़ते हैं ,दसों- दिशायें दंक लेते हो //
मेरे मन की पदचापों पर ,सिर्फ तुम्हारी पदचापें हैं ,
कभी ओस पर तुम चलते हो ,कभी अंक में भर लेते हो //
शायद तुमने इन साँसों में ,तिमिर सिमटता फिर देखा हो //
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