रविवार, 22 जनवरी 2012

अभी -अभी तो मेरे दर पर सुबह सुहानी आकर उतरी ,
कोहरे की चादर में लिपटी धूप सुहानी आकर उतरी /
अभी -अभी तो कलियाँ खिलकर, बस , थोड़ी -सी शरमायीं हैं ,
अभी -अभी तो धुंध हटी है , खुशबु बह -बहकर आयीं हैं /
वृक्षों की भीगी डालों पर , अभी - अभी तो मन भीगा है ,
जाने कितने मौन पलों की , कुंठाएं जीने आयीं हैं /
खग -कूजन की ध्वनियाँ हों या मंदिर -पूजन गूँज रहा हो ,
देखो तो ,वो मदिर -मदिर -सी एक निशानी आकर उतरी /
हर दिन जैसे मेरे दर पर ,कोई यों ही आ जाता है ,
ख्वाब तुम्हारा झिलमिल होकर इन पलकों में उतराता है /
माना कुछ भी नहीं बचा है ,लेकिन फिर भी मैं जिन्दा हूँ ,
इन्हीं सुहाने लम्हों में फिर ,मुझको क्या-क्या हो जाता है /
इस धरती के त्रण-त्रण पर तुम ,प्रतिबिंबित -सी हो जाती हो ,
लगता है फिर जैसे मेरी एक कहानी आकर उतरी /

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

पहले अपनी आदत बदलो, हिंदुस्तान बदल जाएगा ,
थोड़ी -सी तकलीफ उठा लो , हिंदुस्तान बदल जाएगा /
माना कुछ लोगों ने इसको ,लूट लिया है, बेच दिया है ,
उनको जाकर सबक सिखा दो ,हिंदुस्तान बदल जाएगा /
भारत जैसा देश नहीं है ,दुनिया इसको मान चुकी है ,
भारत की तकदीर बनो तुम ,हिंदुस्तान बदल जाएगा /
नहीं किसी से झुकना सीखो ,नहीं किसी का हक़ छिन पाये ,
कोई ऐसी पौध लगाओ ,इसकी इज्जत बदती जाए /
कदम मिलकर चलना सीखो , हिंदुस्तान बदल जाएगा /
कोई छोटा ,बड़ा नहीं है ,मुल्क बराबर सबका होता ,
जिसने इसको दिल से सींचा ,उसका कोई मोल न होता /
आओ ,इसको अपना समझें , हिंदुस्तान बदल जाएगा /

सोमवार, 16 जनवरी 2012

जितनी दिल के पास खड़ी हो ,उतनी मीलों की दूरी है ,
मुझे बताना मेरे मितवा ,ऐसी भी क्या मज़बूरी है /
इस काया में ,आना- जाना , यह दुनिया देखा करती है ,
लेकिन मेरी पलकों में तो ,बस सुबह -शाम की दूरी है /

रविवार, 15 जनवरी 2012

जो राग उठे हैं मेरे मन में, उन्हें दबाकर क्यों रक्खा है,
स्वप्न जगे हैं जो नयनों में , उन्हें सुलाकर क्यों रक्खा है ?
जीने की हर चाहत ने भी , अब जीना जैसे छोड़ दिया ,
जो लम्हे तेरे संग बीते हैं , उन्हें जिलाकर क्यों रक्खा है ?
माना मौसम बदल रहे हैं ,खुशियाँ लेकर आ जाते हैं ,
लेकिन तेरी मुस्कानों के, वो कमल कहाँ खिल पाते हैं ?
झीलें झिलमिल -सी लगतीं हैं ,झरने झर -झर से झरते हैं ,
लेकिन तेरे पंख पखेरू ,मुझे यहाँ कब मिल पाते हैं ?
जग की धूमिल तस्वीरों में , तुझे सजाकर क्यों रक्खा है ?
तुझको रचता हूँ मैं अपने ,सीने की धड़कन से सीकर ,
तुझे खिलाता हूँ मैं अपने ,आँसू की शबनम से धोकर /
मिट्टी के पुतले हैं माना ,लेकिन कोई बात नहीं है ,
तुझे बुलाता हूँ जब भी मैं , रोम -रोम में कलम डुबोकर //
नहीं पता क्यों मैंने तुझको , खुदा बनाकर क्यों रक्खा है ?
तुझको रचता हूँ मैं अपने ,सीने की धड़कन से सीकर ,
तुझे खिलाता हूँ मैं अपने ,आँसू की शबनम से धोकर /
मिट्टी के पुतले हैं माना ,लेकिन कोई बात नहीं है ,
तुझे बुलाता हूँ जब भी मैं , रोम -रोम में कलम डुबोकर //
नहीं पता क्यों मैंने तुझको , खुदा बनाकर क्यों रक्खा है ?
जो राग उठे हैं मेरे मन में, उन्हें दबाकर क्यों रक्खा है,
स्वप्न जगे हैं जो नयनों में , उन्हें सुलाकर क्यों रक्खा है ?
जीने की हर चाहत ने भी , अब जीना जैसे छोड़ दिया ,
जो लम्हे तेरे संग बीते हैं , उन्हें जिलाकर क्यों रक्खा है ?
माना मौसम बदल रहे हैं ,खुशियाँ लेकर आ जाते हैं ,
लेकिन तेरी मुस्कानों के, वो कमल कहाँ खिल पाते हैं ?
झीलें झिलमिल -सी लगतीं हैं ,झरने झर -झर से झरते हैं ,
लेकिन तेरे पंख पखेरू ,मुझे यहाँ कब मिल पाते हैं ?
जग की धूमिल तस्वीरों में , तुझे सजाकर क्यों रक्खा है ?
तुझको रचता हूँ मैं अपने ,सीने की धड़कन से सीकर ,
तुझे खिलाता हूँ मैं अपने ,आँसू की शबनम से धोकर /
माना मौसम बदल रहे हैं ,खुशियाँ लेकर आ जाते हैं ,
लेकिन तेरी मुस्कानों के, वो कमल कहाँ खिल पाते हैं ?
झीलें झिलमिल -सी लगतीं हैं ,झरने झर -झर से झरते हैं ,
लेकिन तेरे पंख पखेरू ,मुझे यहाँ कब मिल पाते हैं ?
जग की धूमिल तस्वीरों में ,तुम्हें सजाकर क्यों रक्खा है ?

शनिवार, 14 जनवरी 2012

जो राग उठे हैं मेरे मन में, उन्हें दबाकर क्यों रक्खा है,
स्वप्न जगे हैं जो नयनों में , उन्हें सुलाकर क्यों रक्खा है ?
जीने की हर चाहत ने भी , अब जीना जैसे छोड़ दिया ,
जो लम्हे बिताये संग - तेरे , उन्हें जिलाकर क्यों रक्खा है ?

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

वो खेतों की पगडण्डी थी, जिसपर चलने की आदत थी ,
कहीं - कहीं थी ऊँची -नीची, कहीं -कहीं पर फिसलाहट थी /
अगल -बगल में मचल -मचल कर , फसलें लहराया करतीं थीं ,
जाने कितनी आजादी के, अरमान जगाया करतीं थीं //
मैं चलता था संभल -संभल कर, नभ को छूने की चाहत थी /
कभी कृषक के ,कभी श्रमिक के ,उद्वेलन मन में उठते थे ,
कुछ थकित पसीने की बूँदें ले , वो माथे पर खिलते थे //
गेहूँ की बालें छू -छू कर ,आलिंगन करने लगतीं थीं ,
जो बीज धरा पर बोये थे ,खलियानों को भरते थे //
जाने कितनी अलमस्ती थी, जीवन की कितनी आहट थी /
उस पगडण्डी की यादें ले , कुछ समय बिताने लगता हूँ ,
उसपर नित मिलने वालों के , सब लम्हे भुनाने लगता हूँ /
कड़ी धूप में ,बरसातों में , मैं अक्सर निकला करता था ,
सुबह -शाम की तपन हजारों , मैं वहीँ बुझाने लगता हूँ //
संकरीली -सी, मटमैली -सी ,लेकिन वो मेरी ताकत थी ,
वो खेतों की पगडण्डी थी ,जिसपर चलने की आदत थी /
वो खेतों की पगडण्डी थी, जिसपर चलने की आदत थी ,
कहीं - कहीं थी ऊँची -नीची, कहीं -कहीं पर फिसलाहट थी /
अगल -बगल में मचल -मचल कर , फसलें लहराया करतीं थीं ,
जाने कितनी आजादी के, अरमान जगाया करतीं थीं //
मैं चलता था संभल -संभल कर, नभ को छूने की चाहत थी /
कभी कृषक के ,कभी श्रमिक के ,उद्वेलन मन में उठते थे ,
कुछ थकित पसीने की बूँदें ले , वो माथे पर खिलते थे //
गेहूँ की बालें छू -छू कर ,आलिंगन करने लगतीं थीं ,
जो बीज धरा पर बोये थे ,खलियानों को भरते थे //
जाने कितनी अलमस्ती थी, जीवन की कितनी आहट थी /

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

खिले हुए कुछ फूल दिखे तो , समय गुजारा धीरे-धीरे,
पता नहीं कितने काँटों का ,बोझ उतारा धीरे -धीरे //
हमें पता था कुछ मोहक -सा द्रश्य मिलेगा इन राहों में ,
ओस बिछी थी पूरे पथ पर,तुम्हें निहारा धीरे-धीरे //
माना बदले थे सब अपने ,टूट चुके थे कितने सपने ,
कोई बादल उठा गगन में ,उसे पुकारा धीरे-धीरे //
कोई ऐसा दर्द नहीं था , जिसको हमने नहीं बहाया ,
नहा गए थे हम गंगा में ,फिसल-फिसल कर धीरे -धीरे //
कोई मौसम दिखा ना ऐसा ,जिसने हमको नहीं मनाया,
मगर हमारे शोले तुमको ,मना रहे थे धीरे- धीरे //
इन फूलों के हर पाटल पर ,चमक रहीं कुछ मुद्राएँ थीं,
खींच रहीं थीं हमको अपनी ,आँखों से वो धीरे-धीरे //
हमने खुद को खोकर देखा ,सारा कर्ज डुबोकर देखा ,
बचा न हमपर कुछ भी शायद,लुटा दिया था धीरे -धीरे //

सोमवार, 9 जनवरी 2012

खिले हुए कुछ फूल दिखे तो , समय गुजारा धीरे-धीरे,
पता नहीं कितने काँटों का ,बोझ उतारा धीरे -धीरे //
हमें पता था कुछ मोहक -सा द्रश्य मिलेगा इन राहों में ,
ओस बिछी थी पूरे पथ पर,तुम्हें निहारा धीरे-धीरे //
माना बदले थे सब अपने ,टूट चुके थे कितने सपने ,
कोई बादल उठा गगन में ,उसे पुकारा धीरे-धीरे //
कोई ऐसा दर्द नहीं था , जिसको हमने नहीं बहाया ,
नहा गए थे हम गंगा में ,फिसल-फिसल कर धीरे -धीरे //
कोई मौसम दिखा ना ऐसा ,जिसने हमको नहीं मनाया,
मगर हमारे शोलों से बस , सजा किनारा धीरे- धीरे //
खिले हुए कुछ फूल दिखे तो , समय गुजारा धीरे-धीरे,
पता नहीं कितने काँटों का ,बोझ उतारा धीरे -धीरे //
हमें पता था कुछ मोहक -सा द्रश्य मिलेगा इन राहों में ,
ओस बिछी थी पूरे पथ पर,तुम्हें निहारा धीरे-धीरे //
माना बदले थे सब अपने ,टूट चुके थे कितने सपने ,
कोई बादल उठा गगन में ,उसे पुकारा धीरे-धीरे //
कोई ऐसा दर्द नहीं था , जिसको हमने नहीं बहाया ,
नहा गए थे हम गंगा में ,फिसल-फिसल कर धीरे -धीरे //
कोई मौसम दिखा ना ऐसा ,जिसने हमको नहीं मनाया,
मगर हमारे शोले तुमको ,मना रहे थे धीरे- धीरे //
खिले हुए कुछ फूल दिखे तो , समय गुजारा धीरे-धीरे,
पता नहीं कितने काँटों का ,बोझ उतारा धीरे -धीरे //
हमें पता था कुछ मोहक -सा द्रश्य मिलेगा इन राहों में ,
ओस बिछी थी पूरे पथ पर,तुम्हें निहारा धीरे-धीरे //
माना बदले थे सब अपने ,टूट चुके थे कितने सपने ,
कोई बादल उठा गगन में ,उसे पुकारा धीरे-धीरे //
कोई ऐसा दर्द नहीं था , जिसको हमने नहीं बहाया ,
नहा गए थे हम गंगा में ,फिसल-फिसल कर धीरे -धीरे //
खिले हुए कुछ फूल दिखे तो , समय गुजारा धीरे-धीरे,
पता नहीं कितने काँटों का ,बोझ उतारा धीरे -धीरे //
हमें पता था कुछ मोहक -सा द्रश्य मिलेगा इन राहों में ,
ओस बिछी थी पूरे पथ पर,तुम्हें निहारा धीरे-धीरे //
माना बदले थे सब अपने ,टूट चुके थे कितने सपने ,
कोई बादल उठा गगन में ,उसे पुकारा धीरे-धीरे //

शनिवार, 7 जनवरी 2012

बहुत सुकोमल कली खिली है ,शायद तुमने भी देखा हो ,
झीलों पर कुछ धूप खिली है ,द्रश्य मनोरम यह देखा हो //
अभी- अभी कुछ पर्वत पिघले ,अभी -अभी कुछ झरने निकले ,
धीमी-धीमी हवा चली है , शायद तुमने भी देखा हो //
कोई दिल की भाषा शायद ,मुखर हुई है अभी -अभी कुछ ,
शायद तुमने इन तरुओं में ,गया जमाना फिर देखा हो //
मेरी भटकी अंखियों में तुम , मचल-मचल कर रह जाते हो ,
एक सलोना सपना शायद ,जीवित तुमने फिर देखा हो //
कहाँ गए हो, पास खड़े हो,महसूस हमेशा होते हो ,
पक्षी नभ में जब उड़ते हैं ,दसों- दिशायें दंक लेते हो //
मेरे मन की पदचापों पर ,सिर्फ तुम्हारी पदचापें हैं ,
कभी ओस पर तुम चलते हो ,कभी अंक में भर लेते हो //
शायद तुमने इन साँसों में ,तिमिर सिमटता फिर देखा हो //
बहुत सुकोमल कली खिली है ,शायद तुमने भी देखा हो ,
बहुत मनोरम धूप खिली है ,शायद झीलों में देखा हो,
अभी- अभी कुछ पर्वत पिघले ,अभी -अभी कुछ झरने निकले ,
धीमी-धीमी हवा चली है , शायद तुमने भी देखा हो //
कोई दिल की भाषा शायद ,मुखर हुई है अभी -अभी कुछ ,
शायद तुमने इन तरुओं में ,गया जमाना फिर देखा हो //
मेरी भटकी अंखियों में तुम , मचल-मचल कर रह जाते हो ,
एक सलोना सपना शायद ,जीवित तुमने फिर देखा हो //

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

बहुत सुकोमल कली खिली है ,शायद तुमने भी देखा हो ,
बहुत मनोरम धूप खिली है ,शायद झीलों में देखा हो,
अभी- अभी कुछ पर्वत पिघले ,अभी -अभी कुछ झरने निकले ,
धीमी-धीमी हवा चली है , शायद तुमने भी देखा हो //
पत्ते खड़के, बुंदियाँ बरसीं ,मेघा नभ में फिर घिर आये /
प्रियतम मेरे ,बिना तुम्हारे ,मनवा कैसे अगन बुझाए //
बहीं द्रगों से यादें तेरी ,किसने देखा ,किसने जाना /
अक्सर तुझको ,हमने इनमें ,भिगो -भिगो कर ही पहचाना //
काया फड़की,बिजली कड़की , मेघा नभ में फिर घिर आये /
अभी बहुत ही सघन घटा थी, द्रश्य बदलते देखे हमने ,
इस धरती से उस अम्बर तक ,स्वप्न मचलते देखे हमने //
अभी धरा पर अंकुर फूटे ,अभी तुम्हारा मुखड़ा देखा ,
पता नहीं कितने जन्मों के भाव उमड़ते देखे हमने //
बिम्ब हुए थे कितने झिलमिल , बदरा नभ में फिर घिर आये //
शायद कुछ पल ऐसे आयें ,पास तुम्हें जो फिर ले आयें ,
कुछ तुम ही हममें खो जाओ ,या कुछ हम तुममें खो जायें //
माना दुनिया इक मेला है ,कुछ साँसों का ही खेला है,
आओ हम भी चलकर फिर से,अपनी दुनिया नई बसायें //
टप -टप करते बूंद -बूंद से मेघा नभ में फिर घिर आये //

बुधवार, 4 जनवरी 2012

पत्ते खड़के, बुंदियाँ बरसीं ,मेघा नभ में फिर घिर आये /
प्रियतम मेरे ,बिना तुम्हारे ,मनवा कैसे अगन बुझाए //
बहीं द्रगों से यादें तेरी ,किसने देखा ,किसने जाना /
अक्सर तुझको ,हमने इनमें ,भिगो -भिगो कर ही पहचाना //
काया फड़की,बिजली कड़की , मेघा नभ में फिर घिर आये /
अभी बहुत ही सघन घटा थी, द्रश्य बदलते देखे हमने ,
इस धरती से उस अम्बर तक ,स्वप्न मचलते देखे हमने //
अभी धरा पर अंकुर फूटे ,अभी तुम्हारा मुखड़ा देखा ,
पता नहीं कितने जन्मों के भाव उमड़ते देखे हमने //
बिम्ब हजारों झिलमिल लेकर , बदरा नभ में फिर घिर आये //
अभी बहुत ही सघन घटा थी, द्रश्य बदलते देखे हमने ,
इस धरती से उस अम्बर तक ,स्वप्न मचलते देखे हमने //
कभी धरा पर अंकुर फूटे ,कभी तुम्हारा मुखड़ा देखा ,
पता नहीं कितने जन्मों के भाव उमड़ते देखे हमने //

सोमवार, 2 जनवरी 2012

पत्ते खड़के, बुंदियाँ बरसीं ,मेघा नभ में फिर घिर आये /
प्रियतम मेरे ,बिना तुम्हारे ,मनवा कैसे अगन बुझाए //
बहीं द्रगों से यादें तेरी ,किसने देखा ,किसने जाना /
अक्सर तुझको ,हमने इनमें ,भिगो -भिगो कर ही पहचाना //
काया फड़की,बिजली कड़की , मेघा नभ में फिर घिर आये /