गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

क्यों हजारों दिल हमारे ,पास आते जा रहे हैं ,
क्या तुम्हारी याद इतनी ,रूबरू हमसे हुई है //
प्यार की अंधी गली में ,लोग भटके जा रहे हैं,
क्या तुम्हारे प्यार की बस ,आबरू हमपर बची है //

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

पुतलियों में नभ भरा है ,पुतलियों में जग भरा है ,
रोशनी का पंथ कोई ,पुतलियों में दिख रहा है //
एक दर्पण है तुम्हारा ,एक सागर है तुम्हारा ,
पुतलियों में क्यों अभी तक ,एक जीवन जग रहा है //

रविवार, 25 दिसंबर 2011

नहीं किसी का सुख छीना है, नहीं किसी से की बेमानी,
दाना चुगने में भी डरकर, उड़ा हजारों बार सेलानी //
कभी खेत पर खलियानों पर ,इसने सिक्का नहीं जमाया ,
कभी दिखा तरु शाखों पर तो ,कभी पिया झीलों का पानी //
अभी बहुत उड़ना है इसको ,नये ठिकाने चुनने को ,
अभी थका है नभ का पंछी , कल का सूरज उगने दो //
कितना प्यारा यह लगता है, राजदुलारा यह लगता है ,
इस दुनिया की किस्मत जैसे ,अपने पंखों में रखता है //
चलो इसी से मिलकर आयें , इसको दिल का हाल बतायें ,
आखिर इसके और हमारे, जीवन में क्या निर्भरता है ?
सभी दिशायें खुलने दो , तम के पार निकलने दो ,
अभी थका है नभ का पंछी ,कल का सूरज उगने दो //

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

अभी थका है नभ का पंछी ,कल का सूरज उगने दो ,
सुबह खिलेगी धूप नई फिर , नई उड़ानें भरने को //
तिनका -तिनका जो बीना है ,कुछ तो असर दिखायेगा,
एक घरोंदा अपना होगा ,यही थकानें हरने को //
शब्दों से जब धुन निकलेगी ,साज तुम्हारा उनमें होगा,
जितने दिल में भरे खजाने ,राज तुम्हारा उनमें होगा //
अगर चुनेगा कोई आकर ,बचा हुआ सामान पुराना ,
कंकड़ -पत्थर जो निकलेंगे ,ताज तुम्हारा उनमें होगा //
बुझी नहीं चिंगारी अबतक ,राख तुम्हारी है माथे पर ,
हसरत जलकर बुझी नहीं हैं ,याद तुम्हारी है माथे पर //
शोले कितने दहक रहे हैं ,अभी चिता के तेरी मुझमें ,
दूंद रहा हूँ उनमें तुमको ,फूँक लगाकर मैं माथे पर //
शायद कोई बीते कल का , आज तुम्हारा उनमें होगा //
क्यों होती है इस दुनिया में ,इस जीवन की , ख़तम कहानी ,
रह जाता है क्यों पलकों में , तृष्णाओं का खारा पानी //
अभी हजारों साँसों का वो ,मेला तुमने ही जोड़ा था ,
तुम ही मिलकर बिछुड़ गए क्यों , ध्वस्त हो गयीं सभी निशानी //
अगर खिलीं यह कलियाँ फिर से ,सोज तुम्हारा उनमें होगा //
अभी थका है नभ का पंछी ,कल का सूरज उगने दो ,
सुबह खिलेगी धूप नई फिर , नई उड़ानें भरने को //

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

इसी नजर से हमने तुमको ,कितनी बार निहारा उस दिन ,
इसी नजर में अब तो दिन का ,सूरज गलकर बह जाता है //
इसी नजर में तुम्हें समाया, इसी नजर में तुम्हें बिठाया,
लेकिन अब तो पलकों में बस ,हुस्न बिखर कर रह जाता है //
कोई डालों पर खिलता है , कोई शाखों पर खिलता है,
लेकिन तेरा चेहरा हरदम ,इन पलकों में ही खिलता है //
फूल हजारों देखे हमने ,कुछ यहाँ खिले कुछ वहाँ खिले,
लेकिन तेरी धूपों का बस , सपना इनमें ही दलता है //

रविवार, 18 दिसंबर 2011

फिर उसी का दर्द उभरा , फिर उसी की याद आई ,
धूप में बिखरी हुई -सी , ताजगी की याद आई //

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

सूरज जब नभ में दिखता है , कण-कण में सूरज उगता है/
चंदा जब नभ में घुलता है, धरती पर नूर बरसता है //
यह चमक कहाँ से आती है, यह दमक कहाँ से आती है /
है कौन यहाँ पर जो इतना ,आकर्षण आकर भरता है //
सूरज जब नभ में दिखता है , कण-कण में सूरज उगता है/
चंदा जब नभ में खिलता है, धरती का बदन निखरता है //
यह चमक कहाँ से आती है, यह दमक कहाँ से आती है /
है कौन यहाँ पर जो अपना ,आकर्षण जग में भरता है //

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

चलो चलें हम चलकर देखें , यह नदी कहाँ तक बहती है /
यह हवा कहाँ तक चलती है ,यह शाम कहाँ पर होती है //
यह सारी सीमायें आखिर ,किस पर्वत पर जाकर मिलतीं /
यह पक्षी नभ में क्यों उड़ते हैं ,यह सुबह कहाँ पर रहती है //

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

कुछ खामोशियाँ भर दीं मन में ,कुछ आगोशियाँ भर दीं तन में /
चाहतों से जब भी गुजरे हम ,कुछ मदहोशियाँ भर दीं तुमने //
वो धड्कनें अभी तक झनकतीं हैं ,जिन्हें तुमने सहलाया था /
इस निस्तब्ध संसृति में जैसे ,कुछ चिंगारियां भर दीं तुमने //
कुछ खामोशियाँ भर दीं मन में ,कुछ आगोशियाँ भर दीं तन में /
चाहतों में जब भी गुजरे हम ,कुछ मदहोशियाँ भर दीं तुमने //

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

आज दिनांक - 6, १२, २०११ -वैशाली , गाजियाबाद में श्री देवेन्द्र चौधरी 'तुषार' के निवास स्थान पर एक भावभीनी काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ /जिसमें गाजियाबाद ,बागपत, तथा दिल्ली से निमंत्रित कुछ प्रमुख कवियों ने अपना कविता पाठ किया तथा कविता पर काफी बृहद चर्चायें हुईं /गोष्ठी की अध्यक्षता ''तुषार ''ने की /संचालन श्री मोहन द्विवेदी ने किया /'' तुषार '' ने अपने गीत इस प्रकार सुनाये ----

चाँद नहीं निकला है कबसे , नींदें मुझसे पूछ रहीं हैं /

तू जागा है , या सोया है ,नींदें मुझसे पूछ रहीं हैं //

दूसरा गीत इस प्रकार था ---

खुशबुओं से तरबतर हो यह हवायें बह रहीं हैं /

तुम यहीं हो ,पास में हो , हाल हमसे कह रहीं हैं //

अरुण सागर ने अपना गीत इस प्रकार सुनाया--

आग तृषा की जलाना छोड़ दे

और अभिमानों की गागर फोड़ दे /

तू संजो कर रख ह्रदय में प्रीत रे

झूमकर तू गा ख़ुशी का गीत रे /

चन्द्र भानु मिश्र ने अपना गीत इस प्रकार सुनाया ----

मैंने जिनको सहारा दिया सर्वदा

क्या वे मेरा सहारा बनेंगे कभी /

जिनकी सेवा में मैं आज पत्थर हुआ

काम नहीं आई देवता की दुआ

जिन्दगी यंत्र जिनके लिए बन गई /क्या...

मोहन द्विवेदी की कविता व्यंग करती हुई कुछ कह रही थी---

सोच रहे हैं चतुरी साहब ,पैसे वाला पूरा गाँव

फिर क्यों चलती नहीं दुकान

अब तो बच्चे भी खाते हैं ,गुड से ज्यादा गुटका पान /

आचार्य नगेन्द्र प्रसाद द्विवेदी की कविता शहर और गाँव का अंतर बता रही थी --

शहर का शीशा बड़ा है ,बिम्ब मेरा भी चला है उभरने पटल पर

छोड़कर गाँव ,शोर भरे शहर में , धुंआ भरे नगर में ,कुछ तो हुआ है ?

डा ० जय शंकर शुक्ल की रचना भी नगर की जिन्दगी पर सोच में डूबी थी ----

नगर की यह जिन्दगी है जो हमें सीख देती है ,

राह कितनी भी कठिन हो व्यथित मन को जीत देती है /

इस तरह साहित्यिक काव्य संस्था ''काव्य शिल्पी ''के तत्वावधान यह काव्य गोष्ठी नये आयामों तथा उच्च स्तर के जाने माने कवियों के / सानिध्य में

अपना पूरा काव्य सौष्ठव बिखेरती हुई संपन्न हुई /

प्रेस विज्ञप्ति

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

बहुत खिलौने देखे हमने , एक खिलौना दिलका देखा /
जिसमें केवल सिर्फ तुम्हारा , प्रतिबिंबित -सा दर्पण देखा //
कभी बहुत बहलाया तुमने , कभी बहुत भरमाया तुमने /
मौन समर्पण देकर उसको , अंतर से सहलाया तुमने //
जब भी उसको विगलित देखा ,आँचल -पट से दंक डाला था /
साँस - साँस में हमने शायद , इस जीवन का तर्पण देखा //
बहुत खिलौने देखे हमने , एक खिलौना दिलका देखा /
जिसमें केवल सिर्फ तुम्हारा , प्रतिबिंबित -सा दर्पण देखा //
कभी बहुत बहलाया तुमने , कभी बहुत भरमाया तुमने /
मौन समर्पण देकर तुमने , अंतर से सहलाया तुमने //
साँस - साँस में हमने शायद , इस जीवन का तर्पण देखा //

रविवार, 4 दिसंबर 2011

चल रहा हूँ सृष्टि की पतवार खेकर ,
क्या पता तूफ़ान कितने हैं यहाँ पर /
क्या बचाऊं, क्या लुटाऊं ,
क्या पता सामान कितने हैं यहाँ पर //

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

सूरज डूबा , शाम दली है ,आधा -आधा चाँद खिला है ,
पक्षी थककर बापस लौटे , तेरा कुछ पैगाम मिला है //
मन के भीतर तुझको देखा , तन के भीतर तुझको देखा ,
तेरे तटबंधों पर ही बस, जीवन को विश्राम मिला है //
सूरज डूबा , शाम दली है ,आधा -आधा चाँद खिला है ,
पक्षी थककर बापस लौटे , तेरा कुछ पैगाम मिला है //