भीगे पथ से अग्नि पथ तक
मंगलवार, 20 दिसंबर 2011
इसी नजर से हमने तुमको ,कितनी बार निहारा उस दिन ,
इसी नजर में अब तो दिन का ,सूरज गलकर बह जाता है //
इसी नजर में तुम्हें समाया, इसी नजर में तुम्हें बिठाया,
लेकिन अब तो पलकों में बस ,हुस्न बिखर कर रह जाता है //
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