आज दिनांक - 6, १२, २०११ -वैशाली , गाजियाबाद में श्री देवेन्द्र चौधरी 'तुषार' के निवास स्थान पर एक भावभीनी काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ /जिसमें गाजियाबाद ,बागपत, तथा दिल्ली से निमंत्रित कुछ प्रमुख कवियों ने अपना कविता पाठ किया तथा कविता पर काफी बृहद चर्चायें हुईं /गोष्ठी की अध्यक्षता ''तुषार ''ने की /संचालन श्री मोहन द्विवेदी ने किया /'' तुषार '' ने अपने गीत इस प्रकार सुनाये ----
चाँद नहीं निकला है कबसे , नींदें मुझसे पूछ रहीं हैं /
तू जागा है , या सोया है ,नींदें मुझसे पूछ रहीं हैं //
दूसरा गीत इस प्रकार था ---
खुशबुओं से तरबतर हो यह हवायें बह रहीं हैं /
तुम यहीं हो ,पास में हो , हाल हमसे कह रहीं हैं //
अरुण सागर ने अपना गीत इस प्रकार सुनाया--
आग तृषा की जलाना छोड़ दे
और अभिमानों की गागर फोड़ दे /
तू संजो कर रख ह्रदय में प्रीत रे
झूमकर तू गा ख़ुशी का गीत रे /
चन्द्र भानु मिश्र ने अपना गीत इस प्रकार सुनाया ----
मैंने जिनको सहारा दिया सर्वदा
क्या वे मेरा सहारा बनेंगे कभी /
जिनकी सेवा में मैं आज पत्थर हुआ
काम नहीं आई देवता की दुआ
जिन्दगी यंत्र जिनके लिए बन गई /क्या...
मोहन द्विवेदी की कविता व्यंग करती हुई कुछ कह रही थी---
सोच रहे हैं चतुरी साहब ,पैसे वाला पूरा गाँव
फिर क्यों चलती नहीं दुकान
अब तो बच्चे भी खाते हैं ,गुड से ज्यादा गुटका पान /
आचार्य नगेन्द्र प्रसाद द्विवेदी की कविता शहर और गाँव का अंतर बता रही थी --
शहर का शीशा बड़ा है ,बिम्ब मेरा भी चला है उभरने पटल पर
छोड़कर गाँव ,शोर भरे शहर में , धुंआ भरे नगर में ,कुछ तो हुआ है ?
डा ० जय शंकर शुक्ल की रचना भी नगर की जिन्दगी पर सोच में डूबी थी ----
नगर की यह जिन्दगी है जो हमें सीख देती है ,
राह कितनी भी कठिन हो व्यथित मन को जीत देती है /
इस तरह साहित्यिक काव्य संस्था ''काव्य शिल्पी ''के तत्वावधान यह काव्य गोष्ठी नये आयामों तथा उच्च स्तर के जाने माने कवियों के / सानिध्य में
अपना पूरा काव्य सौष्ठव बिखेरती हुई संपन्न हुई /
प्रेस विज्ञप्ति
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें