रविवार, 25 दिसंबर 2011

नहीं किसी का सुख छीना है, नहीं किसी से की बेमानी,
दाना चुगने में भी डरकर, उड़ा हजारों बार सेलानी //
कभी खेत पर खलियानों पर ,इसने सिक्का नहीं जमाया ,
कभी दिखा तरु शाखों पर तो ,कभी पिया झीलों का पानी //
अभी बहुत उड़ना है इसको ,नये ठिकाने चुनने को ,
अभी थका है नभ का पंछी , कल का सूरज उगने दो //
कितना प्यारा यह लगता है, राजदुलारा यह लगता है ,
इस दुनिया की किस्मत जैसे ,अपने पंखों में रखता है //
चलो इसी से मिलकर आयें , इसको दिल का हाल बतायें ,
आखिर इसके और हमारे, जीवन में क्या निर्भरता है ?
सभी दिशायें खुलने दो , तम के पार निकलने दो ,
अभी थका है नभ का पंछी ,कल का सूरज उगने दो //

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